गुरुवार, 7 मार्च 2013

चोपता : एक अधूरी यात्रा

मेरे सभी साथियों एवं पाठकों को मेरा प्रणाम....! आपने मेरी पिछली "औली यात्रा"  के वृत्तांतों को अवश्य पढ़ा होगा औली यात्रा करने के बाद मुझे फिर से उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध बुग्याल चोपता जाने का अवसर मिला। यह यात्रा मैंने जल्दबाजी में बिना किसी जानकारी को एकत्र किये बिना मार्च २०१३ में की। मार्च में चोपता के बुग्याल एवं रस्ते बर्फ से ढंके होते है जिस की जानकारी मुझे चोपता जाने के बाद हुयी। बर्फ से बंद रास्तों की वजह से चोपता नहीं पहुँच पाये इसलिए इस यात्रा वृत्तांत को पढ़ने से पहले यह समझ लें इसमें चोपता की वादियों, बुग्यालों की बातें तो अवश्य मिलेंगी परन्तु चोपता की हसीन वादियों का लुत्फ़ नहीं मिलेगा। इसलिए ही इस यात्रा शीर्षक को मेरे द्वारा "चोपता: एक अधूरी यात्रा" का नाम दिया गया है। अतः "चोपता: एक अधूरी यात्रा" के संस्मरणों का उल्लेख अपने इस प्रसिद्धि प्राप्त हिन्दी ब्लॉग "मुसाफिरनामा" के माध्यम से इस उम्मीद के साथ आपके सम्मुख रखने का शुभारम्भ करने जा रहा हूँ कि आपको जरूर पसंद आएगा। 

अब यात्रा वृत्तांत पर चले हैं.…!  
फ़रवरी माह था सर्दी का मौसम समाप्ति की ओर था, इधर मुझे कही किसी यात्रा पर गए हुए काफी दिन हो गए थे, मुझे हमेशा ही हिमालय के पहाड़ अपनी ओर आकर्षित करते रहे है, जिस कारण इस बार भी मन ने आदेश किया कि "हिमालय " चलो। संयोग से हरिद्वार में एक निजी कार्य भी पड़ गया, बस अब तो निश्चित हो गया कि उत्तराखंड के किसी शांत पहाड़ी स्थल पर चला जाय.……? चोपता … ! एक दम दिमाग में आया। बस फिर क्या था चोपता के हरे-भरे बुग्यालों बीच जीवन के चंद दिन बिताना पक्का हुआ, इधर होली का त्यौहार भी नजदीक था, इसलिए होली के बाद जाने का निर्णय लिया। चोपता चलने के लिए अपने एक सहकर्मी मित्र श्री चंद्रप्रकाश भारद्वाज जी से कहा तो उन्होंने भी हाँ कर दी.… तारीख तय हुई ०७  मार्च २०१३। अपने ड्राइवर प्रदीप को बता दिया गया कि ०७ मार्च को हरिद्वार चलना है तथा  उसके बाद अगले तीन-चार दिनों की यात्रा करेंगे जो पूरी पहाड़ी रास्तो पर होगी। अत: गाड़ी के ब्रेक, हॉर्न आदि सर्विस सेंटर पर दिखा लेना  ताकि ऊपर रास्ते में कही कोई समस्या न खड़ी हो। हरिद्वार में भी हर की पौड़ी के नजदीक के एक होटल में ०७ मार्च के लिए एक कमरा भी बुक करा दिया गया। 

आखिर ०७ मार्च आ ही गयी और अपने मित्र को लेकर दोपहर बाद ३.०० बजे फर्रुखाबाद से चल दिए, दूरी लगभग ३७० किलोमीटर की थी, फिर भी बरेली, रामपुर, मुरादाबाद के जामो को झेलते हुए रात ९.०० बजे हरिद्वार से लगभग बीस कि०मी० पहले ढाबे पर  खाना खाने के लिए गाड़ी को रोका। खाना खाने के बाद १०.०० बजे हम लोग हरिद्वार की ओर बढ़े और रात को १०.३० बजे हरिद्वार पहुँच गए। गाड़ी को हर की पौड़ी पर पार्किंग में खड़ी कर पहले से बुक कराये गए होटल में अपने कमरे में पहुँच गए। चूँकि खाना अभी कुछ देर पहले ही ढाबा पर खाया था इसलिए बस सोना ही शेष रह गया था। कमरे में एक डबल-बेड पड़ा था हम तीनो लोग उसी बेड पर सोने का उपक्रम करने लगे। 

अगले दिन सुबह नित्यक्रम से निवृत्त होकर १०.०० बजे तक अपना निजी कार्य निबटाया फिर हर की पौड़ी के पीछे वाली सड़क पर बने हुए अनेकों रेस्त्रां में से एक ठीक-ठाक रेस्त्रां में आलू के दो-दो परांठे दही और आचार के साथ खाए फिर अपने होटल के कमरे से अपना सामान लिया और होटल वाले का बाकी भुगतान कर पार्किंग में खड़ी अपनी कार लेकर चोपता के लिए ११.०० बजे प्रस्थान कर दिया। 

पहले कुछ चोपता के बारे में 
चोपता अपने हरे-भरे बुग्यालों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। ( बुग्याल : पहाड़ की ढलानों पर स्थित हरे-भरे घास के मैदानों को कहते हैं )  सर्दियों में चोपता के बुग्याल बर्फ की मोटी चादर से ढक जाते हैं तथा गर्मी शुरू होते ही बर्फ पिघलना शुरू हो जाती है, जिस कारण हरा-भरा बुग्याल अपनी असीम सुंदरता के साथ मनमोहक हो जाता है। शांत वातावरण में चोपता के बुग्याल अत्यन्त मनोहारी दृश्य उत्पन्न करते हैं। चारो तरफ बर्फ से लकदक पहाड़ों की  चोटियाँ मन को शीतलता प्रदान करती हैं। चोपता के पास में ही तीन किलोमीटर ट्रेकिंग के बाद विश्व में सबसे ऊपर स्थित तुंगनाथ महादेव का विश्वप्रसिद्ध मन्दिर है। चारधाम यात्रा (यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ एवं बद्रीनाथ यात्रा) के समय में यहाँ श्रद्धालुओं का आना-जाना काफी संख्या में होता है। चोपता में प्रकृति से एकाकार होते हुए तुंगनाथ महादेव मन्दिर में दर्शन करने से श्रद्धा की भी पूर्ति हो जाती है। चोपता समुद्रतल से लगभग ३६०० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। 
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हमारी कार अब नेशनल हाइवे संख्या -५८ पर चल रही थी, जो देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग तथा चमोली होते हुए बद्रीनाथ तक जाता है। प्रदीप काफी कुशलता कार को चला रहे थे। प्रदीप पहले भी मेरे साथ एक बार वर्ष २०१२ में देवप्रयाग तक आ चुके थे, यह प्रदीप का पहाड़ी रास्तों पर कार चलाने का दूसरा अनुभव था। ऋषिकेश तक काफी भारी ट्रैफिक रहता है तथा ऋषिकेश से ही पहाड़ी रास्ता  शुरू हो जाता है। हम लोग गंगा नदी की किनारे-किनारे शिवपुरी, ब्यासी होते हुए हरिद्वार से ९४ कि०मी० दूर देवप्रयाग २.३० बजे पहुँच गए। देवप्रयाग में बद्रीनाथ से आने  वाली अलकनन्दा नदी एवं गंगोत्री से आने वाली भागीरथी नदी का संगम होता है। श्री भारद्वाज जी ने संगम स्थल देखने की इच्छा व्यक्त की, तो कार सड़क  के किनारे पार्क कर हम लोग झूलापुल से होते हुए नीचे संगम स्थल पर पहुँच गए। भागीरथी का चंचल शोर और अलकनन्दा का शांत स्वरूप एक दूसरे में समाहित हो मोक्षदायनी गंगा नदी में परिवर्तित हो कर जनमानस की प्यास बुझाने हेतु निरंतर प्रवाहित हो रहा था, जो बहुत ही सुन्दर लग रहा था। भीड़-भाड़ नहीं थी बस एक पंडित जी अपनी थाली में चन्दन, रोली लिए पास की गुफा के बाहर बैठे थे, जो स्नान करने वालों के माथे पर तिलक  लगा रहे थे। लगभग एक घंटा रुकने के पश्चात् ३.३० बजे अपने गंतव्य की ओर चल पड़े।  

अब हम लोग अलकनन्दा नदी के साथ-साथ चल रहे थे, लगभग ३० कि०मी० दूर शाम ५.०० बजे श्रीनगर पहुंचे। श्रीनगर से  रास्ते में खाने के लिए कुछ चिप्स, बिस्किट आदि लिए और रुद्रपयाग के लिए निकल पड़े। श्रीनगर अलकनंदा नदी के तट पर बसा हुआ गढ़वाल का सबसे बड़ा शहर है तथा शिक्षा का केन्द्र भी है। यहां हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय है। यह समुद्रतल से ५६० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है तथा यह पौड़ी गढ़वाल जिले में आता है। श्रीनगर से रुद्रप्रयाग की दूरी लगभग ३५ कि०मी० है और रास्ता भी अच्छा नहीं है इसलिए शाम ७.०० बजे के आस-पास हम लोग  रुद्रप्रयाग के नजदीक पहुँच गए। चूँकि अभी मार्च के शुरूआती दिन ही थे इसलिए रुद्रप्रयाग में काफी सर्दी थी फुल स्वेटर सभी लोगो ने पहन रखे थे। रुद्रप्रयाग से एक कि०मी० पहले पांच-छ: होटल सड़क के किनारे बने हुए थे जो बाहर से देखने में ठीक-ठाक लग रहे थे।अपनी कार वहीं रोक ली। यात्रा सीजन न होने के कारण सभी खाली थे ।  मोल-भाव कर एक अच्छे से होटल में बहुत ही कम किराये पर दो डबल बेड का एक कमरा लिया, जिसमें गीज़र सहित सारी सुविधाये उपलब्ध थीं। कितने पर लिया गया यह नहीं बताऊंगा….... चारो धामों के कपाट खुलने के बाद यात्रा सीजन पर यही कमरा कम-से-कम २५००.०० रूपये पर मिलेगा। होटल के  नीचे ही रेस्त्रां भी था। हम तीन लोगो के आलावा दो बैंककर्मी भी होटल में रुके हुए थे, जो वहीं कहीं आस-पास की शाखाओं में कार्यरत थे और बातचीत से दिल्लीवासी होने का आभास दे रहे थे अथवा होंगे लेकिन मुझे क्या....? होटल के कर्मचारियों से खाने के सम्बन्ध में पूछा तो बताया कि........ 

"नीचे रेस्त्रां में खाना चाहिए तो अभी बता दीजिये, यात्रा सीजन नहीं है इसलिए आटा, दाल, सब्जी आदि सामान होटल में मौजूद नहीं है, खाना बनाने के लिए आटा, दाल शहर के अन्दर बाजार से लानी पड़ेगी.......! नहीं तो आप लोगो को अन्दर बाजार में जाकर खाना मिलेगा"। 

रुद्रप्रयाग का बाजार यहाँ से डेढ़ किमी० दूर था, सर्दी भी खूब थी और दिन भर सफ़र करने के कारण थकावट भी लग रही थी इसलिए अन्दर शहर में जाकर खाना खाने की हिम्मत नहीं बची थी। अत: हम लोगों ने सादा भोजन बनाने के लिए आदेश उसी होटल कर्मी को दिया और अपने कमरे में फ्रेश होने चले गए। रात को ९ बजे होटल कर्मी ने खाना खाने के लिए दरवाजा खटखटाया और कहा कि..... 

"खाना तैयार है खाना खा लीजिये चल कर"

दाल-रोटी खाए २४ घंटे हो गए थे, हरिद्वार में सुबह दो-दो पराठे ही सभी ने खाए थे तब से चिप्स और बिस्किट से ही काम चला रहे थे। दाल रोटी सामने देख कर अब रुका नहीं जा रहा था, तत्काल खाने का नम्बर लगा दिया जब पेट भर गया तब सुकून आया। खाना खाने के बाद हम लोग सोने के लिए कमरे में चले गए।  

अब चित्रावली भी हो जाय ……… 


ब्यासी के निकट गंगा जी पर बना एक झूला पल 
ऊपर सड़क से दिखता देवप्रयाग संगम

देवप्रयाग संगम पर भारद्वाज जी 
भारद्वाज जी 
भारद्वाज जी एवं प्रदीप 
एक फोटो राजपूत जी की भी हो जाय 
ऊपर दिखते इसी झूलापुल से होकर संगम तक आये 

राजपूत जी और भारद्वाज जी 
तिलक लगवाने की फीस निकालते भारद्वाज जी 
वर्ष २०१२ की एक मात्र फोटो: राजपूत जी साथ में प्रदीप 
  अगले भाग में जारी...
                                                                                                              
इस यात्रा वृत्तांत के लेखों की सूची
  1. चोपता : एक अधूरी यात्रा 
  2. रुद्रप्रयाग 
  3. दुगलबिट्टा 
                                                                                                              

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